रविवार, जून 29, 2008

कुछ दिनों के लिये लिखने पढ़ने से विदा...

एक लम्बे अरसे बाद ८ जुलाई को भारत जाना हो रहा, अपने परिवार के साथ रहने का अवसर मिल रहा है अज़ीब सा एहसास है मन में , कभी २ या ३ साल में जो जाने को अवसर मिलता है, क्योंकि यहाँ भी कभी हमें छुट्टी नहीं, कभी हमारे साहब को, तो कभी बच्चों के पेपर, पर अब अच्छा लग रहा है,बस आप लोगों से और नेट से ज्यादा सम्पर्क नहीं रह पायेगा , आप सबको बहुत मिस करूँगी २ महीने बाद मुलाकात होगी ,कोशिश करूँगी इस पर bhawnak2002@gmail.com बने रहने की तब तक लिये लिखने पढ़ने से विदा...

Dr. Bhawna

गुरुवार, जून 26, 2008

जरा आजकल तबियत नासाज़ रहती है लिखने का तो बहुत दिल करता है मगर शब्द हैं कि आह !बनकर उड़ जाते हैं पकड़ने की कोशिश जारी है…


बड़े-बड़े सपने
जो अचानक
दिखाये थे तुमने!
वो सब सपने
दिल की दहलीज़ पर आकर
खुशी में बरसे
आँसुओं की झड़ी में
फिसल कर रह गये…
काश ! मैंने
उन सपनों को
जिया ना होता…
काश ! मैंने उन्हें
सच ना माना होता…
काश ! मैंने उन्हें
दिल की धड़कन में ना समाया होता…
काश !
आँसुओं को झरने से
रोका होता…
तो आज़
मेरे भी वो सपने
साकार होते…
कहते हैं ना
कभी खुशियों को
खा जाती है…
नज़र की डायन…
मेरे साथ भी
ऐसा ही हुआ
जो सपने मेरे थे…
जो कुछ ही पल में
साकार रूप लेने वाले थे…
चुरा लिया उन्हें
कुछ कमजर्फ लोगों ने…
मिटा ली नज़र की डायन ने
उनसे अपनी भूख…
और मेरे सपने
मेरे ही दिल की दहलीज़ से
फिसल कर जा गिरे
उन लोगों के दामन में
जिन्होंने सदा ही
छीना था मेरी खुशियों को…
और आज़
छीन लिया मुझसे
मेरे जीने का हक भी
काश ! मैं उन सपनों को
कहीं छुपाकर रख पाती…
तो आज़ जीने का हक तो ना खोती…
जिन्दा रहती तो
शायद फिर से
अपने दिल के घरौंदे में
सज़ा पाती नये-नये सपनों को…
और साकार कर पाती
हर सम्भव सपने को…
काश ! ऐसा हो पाता…


भावना

सोमवार, जून 16, 2008

एक बार फिर खिले फूल



पर... क्या... इनकी खुशबू आप दोस्तों के बिना कुछ मायने रखती है? बिल्कुल नहीं तो फिर आईये ना... बस थोड़ा सा कष्ट कीजियेगा... और इस लिंक को क्लिक कीजियेगा और अपनी राय जरूर दीजियेगा... आपकी राय के बिना इन फूलों का महत्त्व ही क्या...
रचना यहाँ भी पढ़ी जा सकती है http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/kachnar/bhawna_kunwar.htm

भावना कुँअर

रविवार, जून 08, 2008

वायरस के कारण टूटा आप सब लोगों से रिश्ता...



काफी एंटी वायरस सोफ्टवेयर के होने के बावज़ूद भी वायरस हार्ड डिस्क में पहुँच गया जिसके कारण आप सभी लोगों से सम्पर्क लगभग टूट ही गया आज़ काफी समय बाद कुछ पोस्ट कर पा रही हूँ प्रगीत का लिखा हुआ..


प्रगीत की कलम से...


दर्द के गाँव में भटका हुआ मुसाफिर हूँ

ढूँढ रहा हूँ खुशी का घर

सुना है आँसुओं का सैलाब आया था इस गाँव में

शायद बहा ले गया वो खुशी के घर को भी।


प्रगीत कुँअर

सोमवार, अप्रैल 28, 2008

तो क्या ! अब मुझे हमेशा के लिये अपनी मिट्टी से दूर रहना होगा

आज़ एक खबर पढ़ी, पढ़कर हमारी तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। खबर थी कि अब पी-एच० डी० और एम० फिल० की डिग्री लेकर भी आपको नेट की परीक्षा देनी होगी ऐसा विचार किया जा रहा, अब जब विचार किया जा रहा है तो उसको पूरा भी होते कहाँ देर लगेगी वैसे ही क्या बेरोज़गारी कम है भारत में जो अब और बढ़ाने के रास्ते खोज़े जा रहे ,हैं क्या पी-एच० डी० और एम० फिल० करना इतना आसान है मुझसे पूछो मैंने कितने पापड़ बेले हैं अपनी पी-एच० डी० पूरा करने के लिये तब जाकर इस डिग्री को हासिल किया है, पूरा किया है अपना ख्वाब डिग्री कॉलेज़ में जॉब करने का।

अगर ये नेट परीक्षा पहले से ही होती तो अच्छा था हम भी देते, हो सकता है अभी भी अच्छा हो, पर अब हम जैसों का क्या?

अब मैं यहाँ युगांडा में हूँ जॉब कर रही हूँ वैसे तो सैटल्ड हूँ अपने वतन से भी जुड़ी हूँ ब्लॉग के माध्यम से लेकिन कभी-कभी एक हूक सी उठती जब अपने वतन की याद आती है तो मन करता है कि सब कुछ छोड़कर चली जाऊँ अपने वतन की छाँव में, पर अब ये खबर पढ़कर तो लगता है वो छाँव मुझे अब कभी भी नसीब नहीं होगी, क्या मैं भारत जाकर पहले नेट का पेपर दूँ? फिर से पढ़ूँ? तो मतलब ये हुआ की मेरी इतने सालों की नौकरी, मेरी इतने सालों की पढ़ाई सब बेकार थी और मैं घर में बैठकर मक्खियाँ मारूँ, नहीं ये सब कैसे कर सकूँगी पढ़ना पढ़ाना मेरी जिंदगी की साँसे है, मेरी धड़कन है तो क्या मैं अपनी धड़कन के बिना जिंदा रह पाऊँगी ? अब मैं बहुत असमंजस में हूँ कि क्या कभी मैं अपना ख्वाब पूरा कर पाऊँगी...
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डॉ० भावना
मेरा आशय किसी को भी आहत करने का नहीं था, जो बात इस समाचार को पढ़कर मेरे दिल में आई वही मैंने आप दोस्तों से शेयर करना चाही ....
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